Monologue
गली में ग़मगीन गाना गाना ग़लत नहीं है, लेकिन गाना ग़ज़ब का हो और उसके लिए गले में ग़रारे करने ज़रूरी हैं। ग़मज़दा गवैये ग़म कम करने के लिए गया की गुप्त गुफाओं में ग़रारे पहनकर ग़ज़ब के गाने गाते थे। अच्छा गानेवाला ज़िन्दगी से ग़म को ग़ाएब कर दे, गुनाहों को ग़म के सागर से निकालकर गुणों में ढाल दे, तभी वो ग़ज़ब का गवैया है। बड़े बड़े बाग़ियों ने बाग़ों में बग़ावत के वक़्त गाने गाए। होश गुल हो गए गुंडों के। मगर गामा पहलवान के ग़लीचे पर गंदगी और ग़िलाज़त फैल गई। ग़ुस्ताख़ गवैये ग़ाज़ियाबाद से गाड़ीयों में गर्मा-गर्म चाय गुड़ के साथ गटागट पी गए। रास्ते में बहुत शोर-ग़ुल था। वहीं एक अजीब-ओ-ग़रीब लड़का ग़ज़ब की ग़ज़ल गुनगुना रहा था। हाथों में गुल-क़न्द लिए एक लड़की तेज़ गर्मी के कारण ग़श खाकर गिर पड़ी। मुझे यह देखकर बहुत ग़ुस्सा आया।